Thursday, August 11, 2011

आज फिर वही खबर

आज फिर वही खबर
दहेज की आग मे
जला एक घर
जल गए अरमान
जल गए सपने
गिर पड़ा पहाड़
टूट गए अपने
बस रह गयीं
वो लाड़ की
वो नाज़ों की बातें
बचपन की 'उसकी'
शरारतों की यादें।

आज फिर वही खबर
जिसे पढ़ा था कल
जिसे पढ़ा था परसों
जिसे पढ़ते पढ़ते
बीत गए बरसों
बरसों से चल रही है मुहिम
लोगों को समझाने की
परीक्षाओं मे बच्चों से
निबंध लिखवाने की
बीज के बोने की
पेड़ के होने की
फूल भी खिले
फल भी पके
मगर लालच की
शाखाओं को रोक न सके
और रुक  न सकी
छपने से
आज फिर वही खबर ।

2 comments:

दीप्ति शर्मा said...

bahut achhi rachna

vandana said...

ख़बरें यदि बार बार दुहरायी जाती है तो समाज की संवेदनहीनता को ही व्यक्त करती है

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