Wednesday, August 17, 2011

*संगम*


*जिन्दगी की तनहाई में ,बेरुखी क्या चीज है *
*कभी हमसे दूर, तो कभी बिलकुल करीब है*
*न जाने जीवन का फलसफा है क्या *
*कभी  देता गम कभी ख़ुशी का आलम*
*ये सोच कर बेरुखी चली जाती है*
*तनहाई खुशिओं की सौगात लाती है*
*जीवन का खेल है ये *
*तनहाई और बेरुखी का मेल है ये*


4 comments:

जयकृष्ण राय तुषार said...

सुंदर कविता बधाई

जयकृष्ण राय तुषार said...

सुंदर कविता बधाई

निवेदिता श्रीवास्तव said...

सुंदर कविता ......

SANDEEP PANWAR said...

बेहतरीन शब्द

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