Sunday, September 11, 2011

**वो लोकगीत**

न जाने कहाँ
खो गई
मिट्टी की वो
असली खुशबू
गुम हुए
आधुनिकता में
मीठे-सुरीले
वो लोकगीत |


कर्ण-फाड़ू
संगीत ही रहा
वो असली रंगत
नहीं रही
मूल भारत की
याद दिलाती
कहाँ गए
वो लोकगीत |


एफ. एम., पोड ने
निगल लिया
फिल्मी गानों ने
ग्रास लिया
अब तो कोई
सुनता भी नहीं
न गाता कोई
वो लोकगीत |

2 comments:

केवल राम : said...

जिन लोक गीतों में हमारी संस्कृति और रीति रिवाज समाये होते थे आज कहाँ वह नजारा देखने को मिलता है ....आपका आभार

Kailash C Sharma said...

बहुत सच कहा है....आज हम सभ्यता की भाग दौड में अपनी जड़ों से कितने दूर हो गये हैं.

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