Monday, May 6, 2013

सरबजीत की याद में


हिरासत में था
कई सालों से
यातनाओं से घिरा
न्याय की आस लिए
मैं जासूस नहीं
आम इन्सान था
जो गलती कर बैठा
ये देश की सीमायें
नहीं जानी कभी
सब अपना सा लगा पर
बर्बरतापूर्ण व्यवहार जो किया
वो कब तक सहता
आज़ाद हो लौटना था मुझे
अपने परिवार के पास
पर वो जेहादी ताकतें
मुझ पर हावी थीं
नफरत का शिकार बना
और क्रूरता के इस खेल में
मुझे अपनी सच्चाई की कीमत
जान देकर चुकानी पड़ी ।
सुनो मैं अब भी कहता हूँ
मैं जासूस नहीं था
पर  अपने ही देश ने मुझे
बेसहारा छोड़ दिया था
उस पडोसी देश की जेल में
परिवार से दूर कितनी ही यातनायें सहीं
बार बार हमले हुए
पर आख़िरकार इस बार
मैं हार गया
नहीं जीत पाया
मैं हार गया ।

3 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

बहुत सही और अच्छा लिखा है।


सादर

दिगम्बर नासवा said...

मार्मिक ... बहुत ही संवेदनशील लिखा है ...

प्रवीण पाण्डेय said...

मार्मिक, देश की सीमायें किस सीमा तक घातक हैं, जीवन्त उदाहरण।

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