Monday, September 2, 2013

वो

एकांत में एकदम चुप 
 कँपते ठंडे पड़े हाथों को
 आपस की रगड़ से गरम करती
 वो शांत है 
 ना भूख है
 ना प्यास है
 बस बैठी है 
उड़ते पंछीयों को देखती 
घास को छूती
 तो कभी सहलाती 
और कभी उखाड़ती है
 जिस पर वो बैठी है 
 उसी बग़ीचे में 
जहाँ के फूलों से प्यार है
 पर वो फूल सूख रहें हैं
 धीरे धीरे फीके पड़ रहें हैं
 उनके साथ बैठकर
 जो डर जाता रहा 
अकेलेपन का 
अब फिर वो हावी हो रहा है
 इन फूलों के खतम होने के साथ
 ये डर भी बढ़ रहा है 
फिर कैसे सँभाल पाएगी
 वो इन कँपते हाथों को,
 लड़खड़ाते पैरों को 
 इन ठंडे पड़े हाथों की रगड़ भी 
 फिर गरमी नहीं दे पाएगी 
 वो भी मुरझा जायेगी
 इन फूलों के साथ । 

© दीप्ति शर्मा

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