Thursday, April 5, 2012

मेरे दिल में इक विरहन है बसी वो गीत विरह गाती है....

जब चाँद उबासी लेता है वो निपट अकेले आती है...
आँखों को खोल के वो हर शब् कुछ पानी सा छलकाती है...
इक पल में ही रो देती है इक ही पल में मुस्काती है, 
मेरे दिल में इक विरहन है बसी वो गीत विरह गाती है.... 

वो साँझ दुपट्टे के कोने को नम सा तब कर जाती है...
मैं तन्हाई में रहता हूँ और याद किसी की आती है...
वो गाती है तो कोयल भी संग उसके मुझे रुलाती है, 
मेरे दिल में इक विरहन है बसी वो गीत विरह गाती है.... 

दिनभर की थकन को भूल के मैं उसके रंग में रंग जाता हु...
उसे लाख मना कर दू पर फिर उसके ही साथ में गाता हूँ..
मैं हूँ इक अदना सा गायक वो मुझको गीत सिखाती है,
मेरे दिल में इक विरहन है बसी वो गीत विरह गाती है.... 

हर रात मेरी महफ़िल चंदा के साथ रूबरू होती है
जब गाती है विरहन तो धरती भी बदरा संग रोती है
वो धरती-अस्मा, चाँद-सितारे सब को खूब सताती है 
मेरे दिल में इक विरहन है बसी वो गीत विरह गाती है.... 


ये मदिरा है दीवानों की मद इसका कम नहीं होता...
ख्वाब में जगता है इंसा और आँख खुली में है सोता...
ऐसी अद्भुत इस मदिरा में वो विरहन गोते खाती है...
मेरे दिल में इक विरहन है बसी वो गीत विरह गाती है.... 

इश्क में जीने से तो "अर्पित" विरह में जीना बेहतर है...
जिसको विरह नहीं हासिल उसका तो जीवन बदतर है...
विरह में राधा, मीरा, शबरी खुद को स्याम बताती है...
मेरे दिल में इक विरहन है बसी वो गीत विरह गाती है....

-अर्पित

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

विरह निभाना बड़ा कठिन है।

Vishaal Charchchit said...

अत्यंत भावपूर्ण एवं सुन्दर रचना !!!

arpit said...

AABHAR

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