Thursday, April 5, 2012

ऊँची चोटियों का अभिमान

उन ऊँची चोटियों को
कितना अभिमान है
उन पर पड़ रही
स्वर्णिम किरणों का
आधार ही तो
उनका श्रृंगार है ।

घाटियों की गहराई
विजन में ज़ज़्ब
यादों की अवहित्था
इनकी मिसाल है
उन ऊँची चोटियों को
कितना अभिमान है ।

तासीर देते वो एकांत
में खड़े मौन वृक्ष
उन चोटियों की
अटूट पहचान है
जर्रे जर्रे में महकती
चोटियों को छूती
वो मन्द मन्द पवन
हर कूचे में सरेआम है
उन ऊँची चोटियों को
कितना अभिमान है ।
© दीप्ति शर्मा

2 comments:

Mamta Bajpai said...

हाँ ....उचा होना बड़ी बात है पर ......अभिमान ??

टिकता नहीं है किसी का भी .......
इसलिए ...मुझे लगता है ऊंचाई के साथ विनम्र भी होना चाहिए चोटियों को


अच्छी रचना के लिए बधाई

Vishaal Charchchit said...

वाह दीप्ति वाह............अत्यंत सुन्दर रचना !!!

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