Sunday, February 17, 2013

कहीं ऐसा तो नहीं.....

कहीं ऐसा तो नहीं
ग्लोबल वार्मिंग की वार्निंग को
धता बताते हुए
इंसानी संगत का
खुद पर असर जताते हुए
हो दरअसल यह सावन ही
और हम समझ बैठे हों बसंत
गली की कीचड़ में
डुबकी लगाते हुए
शहर में होते हुए
और गाँव का
धोखा खाते हुए। 
©यशवन्त माथुर©

1 comment:

Shalini Rastogi said...

बहुत खूब यशवंत जी...इंसान ने बहुत चालाकी दिखा लि प्रकृति कि...अब प्रकृति की बारी है

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