Tuesday, August 23, 2011

जिन्दगी


उलझनों में जीती हुए मैं,
जिन्दगी को तलाश रही हूँ|
जगती हुई उन तमाम
अडचनों के साथ मैं खुश
रह जिन्दगी निखार रही हूँ |

बेवजह की उस उदासी का
जिक्र चला यादो की चादर से
खुद को पहचान रही हूँ|

गम भुला के दिल की उन
उम्मीदों को दिल मे बसा
तेरी यादों को ठुकरा रही हूँ |

जीने की चाह मे आह को भूला
चेहरे के तासुर  में गम छिपा
जिन्दगी को तलाश रही हूँ |
- दीप्ति शर्मा 

www.deepti09sharma.blogspot.com

3 comments:

prerna argal said...

bahut hi sunder bhav liye saarthak rachanaa.badhaai aapko.janmashtami ki bahut shubhkamnaayen.
मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद /मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है /आभार /

Apanatva said...

nice.

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ बेहतरीन लेखन के लिए बढ़िया

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