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Saturday, September 29, 2012

खाली हाथ ..



सूरज आता खाली हाथ ... चाँद खाली हाथ जाता है 
कुछ खुशियाँ खोजने में ...पूरा दिन निकल जाता है ||

इस कद्र पड़ी है महंगाई की मार सब पर 
अब आम दिनों सा... त्यौहार निकल जाता है ..||

झूठे वादें झूटी कसमें और बेफिजूल की रस्में 
इन्ही चक्करों में सबका संसार निकल जाता है 

जेब में जब आ जाता है गाँधी उनके ..
मन से उनके गाँधी बनने का विचार निकल जाता है

लाख चाहता है हर एक ..."अन्ना" के रास्ते पर चलना 
पर जिन्दगी की रेस में ..आगे... भ्रष्टाचार निकल जाता है ||

चारों और से मजबूर आँखें ....जब शौर करती है 
तब वो आँख पर पर्दा कर ....घर से बाहर निकल जाता है ||
चाहता तो  मैं भी हूँ उसके लिए ताजमहल बनवाना 
कांग्रेस के दौर में फटी जेब से... सारा प्यार निकल जाता है :)

Sunday, October 2, 2011

बापू की याद , गांधी को नमन ...!!

आओ चलो एक दिन, बापू को याद कर लें
गांधी के बूते तो, हर दिन गुजारा है
बापू के संस्कार तो, खो गये धुल में
अब तो माई बाप, सिर्फ गांधी हमारा है||

मैं बापू को नहीं जानता, लेकिन गांधी को मानता हूँ
क्यूंकि बापू के संस्कारों से, अब पेट नहीं भरता है
इस देश पर हर जगह, गांधी ही तो राज करता है ||

गांधी तो स्विस बैंकों में, फरमा रहें है आराम
टूटा हुआ खड़ा सड़क पे, बापू बेचारा है |
बापू के संस्कार तो, खो गये धुल में
अब तो माई बाप, गांधी हमारा है||

बापू तेरे नाम पे , एक वक्त की रोटी तक नहीं मिलती
राशन से प्रशासन तक, सिर्फ गांधी की है चलती ||
बापू तेरा दिन है आज , अवकाश हमारा है
लेकिन पुरे दिन को काटने में, सिर्फ गांधी का सहारा है ||

बापू तू दुखी ना हो , तेरे बूते ही ये देश चल रहा है
बापू बन के ना सही, गांधी बन के तू, हमारे दिलो में पल रहा है ||

Wednesday, September 7, 2011

आज मेरा गम, तेरे गम सा क्यूँ है ?


आज मेरा गम, तेरे गम सा क्यूँ है ?
हम सब सुरक्षित है, यह वहम सा क्यूँ है ?
जख्म बन चुका है नासूर
पर वो ही पुराना मरहम सा क्यूँ है ?

बेकसूरों को मुआवजा , जान कि कीमत ?
और खुनी को बिरयानी , दामाद सी आवभगत
इस देश में ऐसा, नियम सा क्यूँ है ?
आज मेरा गम, तेरे गम सा क्यूँ है ?

गांधी भी चुप हैं , और भगतसिंह भी मौन है
सब जानते है पता कातिल का ....
पर सब "बन" के पूछ रहें है, कि अपराधी कौन है ?
आँख बंद करने से मौत टल जायेगी, तुझे ऐसा भ्रम सा क्यूँ है ?
आज मेरा गम, तेरे गम सा क्यूँ है ?

इन सफेदपोशों को, आईना भी, चेहरा कैसे दिखा देता है ?
बेशर्मी इतनी लहू में इनकें , लाशों पे राजनीति करना सीखा देता है
मारें तुने बेगुनाह हजारों , कभी कोर्ट में कभी फोर्ट में , कभी रोड पे कभी मोड़ पे
पर यह तो बता , इन सफेदपोश गद्दारों पे तेरा रहम सा क्यूँ है ?
आज मेरा गम, तेरे गम सा क्यूँ है ?
हम सब सुरक्षित है, यह वहम सा क्यूँ है ?

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